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जगन्नाथ पुरी के राजा का राष्ट्रपति और पीएम को लेटर:कहा- ISKCON का अलग समय पर रथयात्रा आयोजित करना गलत; परंपरा की रक्षा करने की अपील

ओडिशा के पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री मोदी को लेटर लिखकर जगन्नाथ मंदिर की प्राचीन परंपरा की रक्षा की मांग की है। 8 जुलाई को लिखे लेटर में गजपति ने ISKCON की तरफ से अलग समय पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने की आलोचना की। गजप

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Dainik Bhaskar
Wire Service··4 min read·Via Dainik Bhaskar
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जगन्नाथ पुरी के राजा का राष्ट्रपति और पीएम को लेटर:कहा- ISKCON का अलग समय पर रथयात्रा आयोजित करना गलत; परंपरा की रक्षा करने की अपील
जगन्नाथ पुरी के राजा का राष्ट्रपति और पीएम को लेटर:कहा- ISKCON का अलग समय पर रथयात्रा आयोजित करना गलत; परंपरा की रक्षा करने की अपील

ओडिशा के पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री मोदी को लेटर लिखकर जगन्नाथ मंदिर की प्राचीन परंपरा की रक्षा की मांग की है। 8 जुलाई को लिखे लेटर में गजपति ने ISKCON की तरफ से अलग समय पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने की आलोचना की। गजपति महाराज दिब्यसिंह देब श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के अध्यक्ष भी हैं। उनका कहना है कि ISKCON रथयात्रा का आयोजन ऐसी तारीखों पर कर रहा है, जो शास्त्रों के अनुसार नहीं हैं। इससे भक्तों की भावनाएं आहत हो रही हैं। महाराज दिव्यसिंह देव का 17 वर्ष की आयु में राज्याभिषेक हुआ पुरी के वर्तमान गजपति महाराज हैं, जिन्हें जगन्नाथ संस्कृति में 'ठाकुर राजा' का दर्जा प्राप्त है। परंपरा के अनुसार, वे भगवान जगन्नाथ के प्रमुख सेवक माने जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान रथों पर सोने की झाड़ू से बुहारने की पवित्र सेवा (जिसे 'छेरा पंहरा' कहा जाता है) उन्हीं के द्वारा संपन्न की जाती है। 1970 में मात्र 17 वर्ष की आयु में उनका राज्याभिषेक हुआ था। कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले महाराज दिव्यसिंह देव श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के स्थायी अध्यक्ष भी हैं। मुख्य रथयात्रा 16 जुलाई को, ISKCON ने विदेशों में पहले मनाया उत्सव दरअसल, ISKCON ने 21 जून को लंदन, 14 जून को न्यूयॉर्क सिटी और 5 जुलाई को सिडनी में रथयात्रा निकाली थी। लेकिन इस साल, स्नान पूर्णिमा 29 जून को थी और पुरी में मुख्य रथयात्रा 16 जुलाई को होगी। ISKCON का कहना है कि भगवान जगन्नाथ पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के हैं। विदेशों में मौसम, स्थानीय परिस्थितियों और भक्तों की सुविधा को देखते हुए रथयात्रा की तारीखें अलग-अलग होती हैं ताकि ज्यादा लोग उत्सव में शामिल हों और जगन्नाथ संस्कृति का वैश्विक प्रसार हो। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित रथयात्राओं पर भी जताई आपत्ति गजपति महाराज ने उज्जैन स्थित ISKCON मंदिर की ओर से 16 से 25 जुलाई के बीच मध्य प्रदेश के 66 स्थानों पर रथयात्रा आयोजित करने की योजना पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रथ यात्रा केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाला 9 दिवसीय उत्सव है। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास रचित स्कंद पुराण में भी भगवान जगन्नाथ ने स्वयं स्नान यात्रा और रथयात्रा की निर्धारित तिथि बताई हैं। ऐसे में मनमानी तिथियों पर आयोजित करना प्राचीन परंपराओं और शास्त्रों के विपरीत है। ISKCON का तर्क- विदेशों में हर जगह एक ही दिन आयोजन संभव नहीं पुरी मंदिर की पिछली आपत्तियों का जवाब देते हुए ISKCON ने कहा कि हर देश में जलवायु परिस्थितियों, सरकारी नियमों और स्थानीय सांस्कृतिक कारकों बड़ा असर डालते हैं। इसके कारण शास्त्रों में बताई गई तारीख पर रथयात्रा आयोजित करना हमेशा संभव नहीं होता है। ISKCON ने पुरी मंदिर को बताया था- रूस में वहां का मौसम, सरकार और स्थानीय संस्कृति अक्सर शास्त्रों में बताई गई तारीखों पर रथयात्रा निकालने के अनुकूल नहीं होती है। 2024 में भी रथयात्रा पर विवाद हुआ रथयात्रा को लेकर विवाद नया नहीं है। 2024 और 2025 में भी पुरी के गजपति महाराजा ने ISKCON से अनुरोध किया था कि विदेशों में भी पुरी के धार्मिक पंचांग के अनुसार रथयात्रा आयोजित की जाए। 2026 में यह विवाद इसलिए ज्यादा चर्चा में आया क्योंकि कई देशों में रथयात्रा पुरी की तिथि से कई हफ्ते पहले आयोजित की गई, जिसके बाद औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई गई। -------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… पुरी रथयात्रा: 200 से ज्यादा लोग 58 दिनों में तैयार करते हैं रथ, जानिए यात्रा के बाद इन रथों का क्या होता है हर साल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के 45 फीट ऊंचे तीनों रथ 200 से ज्यादा लोग सिर्फ 58 दिनों में तैयार करते हैं। ये रथ 5 तरह की खास लकड़ियों से पूरी तरह हाथों से बनाए जाते हैं। शुरुआत अक्षय तृतीया से हो जाती है और गुंडिचा यात्रा के दो दिन पहले रथ बन कर तैयार हो जाते हैं। यात्रा खत्म होने के बाद रथों को तोड़ दिया जाता है। पढ़ें पूरी खबर…

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